नवरात्रि का प्रथम दिन: माँ शैलपुत्री, ऊँचाई की पहली शर्त, अपनी जड़ों से जुड़े रहना।

जो टूट गया, वही अंतिम सत्य नहीं है। आप अपने अतीत से बड़े हो सकते हैं। आप अपनी पुरानी पहचान से आगे बढ़ सकते हैं। आप अपने पुराने संस्कारों को समझकर एक नई चेतना का निर्माण कर सकते हैं।

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Maa Shailputri the first form of Goddess Durga and the divine daughter of the Himalayas symbolizes unwavering strength, purity, stability and new beginnings
Maa Shailputri the first form of Goddess Durga and the divine daughter of the Himalayas symbolizes unwavering strength, purity, stability and new beginnings

शैलपुत्री : ऊँचाई की पहली शर्त—अपनी जड़ों से जुड़ना

नवरात्रि का पहला दिन माँ शैलपुत्री की उपासना से प्रारम्भ होता है। सामान्यतः हम शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री और माँ दुर्गा का प्रथम स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं। किन्तु यदि हम इस प्रतीक को थोड़ा गहराई से देखने का प्रयास करें, तो यह केवल एक देवी के पूजन की कथा नहीं रह जाती; यह मनुष्य के अपने भीतर की यात्रा का पहला अध्याय बन जाती है।

आखिर नवरात्रि की शुरुआत शैलपुत्री से ही क्यों?

क्या यह केवल इसलिए है कि वे देवी के नौ स्वरूपों में प्रथम हैं? या इसके पीछे मनुष्य के जीवन और मनोविज्ञान से जुड़ा कोई गहरा संकेत भी छिपा है? मुझे लगता है कि इसका उत्तर ‘पर्वत’ शब्द में ही कहीं छिपा हुआ है। पर्वत ऊँचा होता है, लेकिन उसकी ऊँचाई उसकी जड़ों से अलग नहीं होती। जितना ऊँचा पर्वत दिखाई देता है, उतना ही गहरा उसका आधार धरती में होता है। मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है।

हम सभी ऊँचा उठना चाहते हैं। सफलता चाहते हैं, सम्मान चाहते हैं, प्रभाव चाहते हैं, ज्ञान चाहते हैं, आध्यात्मिक ऊँचाई चाहते हैं। लेकिन हममें से कितने लोग अपनी जड़ों को समझना चाहते हैं?

हम अपनी ऊँचाई की चिंता तो करते हैं, पर अपने आधार की नहीं। और शायद यही कारण है कि हमारी बहुत-सी उपलब्धियाँ हमें स्थिरता नहीं दे पातीं। हम बाहर से बहुत कुछ प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन भीतर से अपने ही जीवन से जुड़े नहीं रह पाते।

माँ शैलपुत्री का प्रथम संदेश शायद यही है—ऊपर उठने से पहले भीतर स्थिर होना सीखो।

‘शैल’ अर्थात् पर्वत और ‘पुत्री’ अर्थात् उससे उत्पन्न। इस प्रतीक को यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो शैलपुत्री हमारे उस व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करती हैं जो अपनी जड़ों, अपने मूल स्वभाव और अस्तित्व के आधार से जुड़ा हुआ है।

आज मनुष्य की एक बड़ी समस्या यह नहीं है कि वह कुछ बन नहीं पाया।

समस्या यह है कि वह यह भूल गया है कि उसे वास्तव में क्या बनना था।

वह दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार अपने व्यक्तित्व का निर्माण करता रहता है।

माता-पिता चाहते हैं कि वह कुछ बने।

समाज चाहता है कि वह कुछ बने।

व्यवसाय उसे कुछ बनने के लिए प्रेरित करता है।

सोशल मीडिया उसे कुछ और बनने के लिए प्रेरित करता है।

और धीरे-धीरे वह स्वयं से यह पूछना ही भूल जाता है—

“मैं वास्तव में कौन हूँ?”

यहीं से ‘तादात्म्य’ का प्रश्न जन्म लेता है।

यदि मेरा तादात्म्य केवल मेरी नौकरी, मेरे पद, मेरी संपत्ति, मेरी उपलब्धियों, मेरे संबंधों या लोगों की मेरे बारे में बनी धारणा से है, तो इनमें से किसी एक के हिलते ही मेरा पूरा व्यक्तित्व हिल सकता है।

लेकिन यदि मेरा तादात्म्य अपने मूल अस्तित्व से है, तो परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, भूमिकाएँ बदल सकती हैं, उपलब्धियाँ आ सकती हैं और जा सकती हैं—फिर भी मेरे भीतर कोई ऐसा केंद्र बना रहता है जो मुझे संभाले रखता है।

शायद यही पर्वत-तत्व है।

पर्वत मौसम बदलने पर अपना अस्तित्व नहीं बदलता।

उस पर वर्षा होती है, बर्फ गिरती है, धूप पड़ती है, आँधियाँ आती हैं; फिर भी वह अपने स्थान पर खड़ा रहता है।

इसका अर्थ जड़ होना नहीं है।

इसका अर्थ है—परिस्थितियों के बीच अपनी आंतरिक स्थिरता को बनाए रखना।

माँ शैलपुत्री का वाहन वृषभ है।

वृषभ को हम शक्ति, श्रम, धैर्य और कर्मशीलता के प्रतीक के रूप में भी देख सकते हैं। हाथ में त्रिशूल है और दूसरे हाथ में कमल।

एक ओर शक्ति और विवेक का संकेत है, दूसरी ओर पवित्रता और प्रस्फुटन का।

मानो जीवन हमें बता रहा हो—

स्थिरता का अर्थ निष्क्रियता नहीं है।

जमीन से जुड़ना संसार से भागना नहीं है।

और आध्यात्मिकता का अर्थ कर्म से विमुख होना भी नहीं है।

वास्तविक आध्यात्मिकता तो ऐसी स्थिरता देती है, जिसके आधार पर मनुष्य संसार में और अधिक सजगता, साहस और करुणा के साथ कर्म कर सके।

शैलपुत्री का एक और गहरा पक्ष है।

वे वही शक्ति हैं जिन्हें हम पार्वती के रूप में भी जानते हैं—अर्थात् वही शक्ति जो एक जन्म में सती थीं और दूसरे जन्म में पर्वतराज की पुत्री के रूप में प्रकट हुईं।

इसे यदि मनोवैज्ञानिक प्रतीक के रूप में देखें तो इसमें एक अत्यंत सुंदर संदेश छिपा है—

मनुष्य के जीवन में भी पुनर्जन्म संभव है।

शरीर का नहीं, चेतना का।

कभी-कभी जीवन में कोई अनुभव हमें भीतर से तोड़ देता है। कोई संबंध टूटता है, कोई सपना टूटता है, कोई विश्वास टूटता है, कोई पहचान टूटती है।

हमें लगता है कि सब समाप्त हो गया।

लेकिन शायद वही अंत किसी नए आरम्भ की भूमि तैयार कर रहा होता है।

सती के देह-त्याग के बाद पार्वती के रूप में उसी शक्ति की एक नई यात्रा का आरम्भ होता है।

अर्थात्—

जो टूट गया, वही अंतिम सत्य नहीं है।

आप अपने अतीत से बड़े हो सकते हैं।

आप अपनी पुरानी पहचान से आगे बढ़ सकते हैं।

आप अपने पुराने संस्कारों को समझकर एक नई चेतना का निर्माण कर सकते हैं।

इसीलिए नवरात्रि का पहला दिन केवल शक्ति की पूजा का दिन नहीं लगता; यह आत्म-पुनर्सृजन की घोषणा भी प्रतीत होता है।

लेकिन इस पुनर्निर्माण की पहली शर्त क्या है?

अपनी जड़ों को स्वीकार करना।

हम अक्सर अपने अतीत से भागना चाहते हैं।

हमें अपने जीवन की कमजोरियाँ पसंद नहीं होतीं। हम अपनी गलतियों को छिपाना चाहते हैं। अपने संघर्षों को भूल जाना चाहते हैं। अपने भीतर के भय को स्वीकार नहीं करना चाहते।

किन्तु जिस मनुष्य ने अपने अतीत को स्वीकार नहीं किया, वह उससे मुक्त भी नहीं हो सकता।

पर्वत अपनी चट्टानों को अस्वीकार करके पर्वत नहीं बनता।

उसी प्रकार मनुष्य भी अपने जीवन के सुख-दुःख, सफलता-असफलता, गुण-दोष और अनुभवों को स्वीकार करके ही पूर्णता की ओर बढ़ता है।

इसलिए शैलपुत्री की पूजा करते हुए शायद हमें बाहर किसी शक्ति को प्रसन्न करने से अधिक अपने भीतर एक प्रश्न जगाना चाहिए—

“मेरे जीवन का पर्वत कहाँ है?”

वह कौन-सा मूल्य है जिसके लिए मैं परिस्थितियों के बदलने पर भी खड़ा रह सकता हूँ?

वह कौन-सा सत्य है जिसे मैं सुविधा के लिए नहीं छोड़ूँगा?

वह कौन-सा स्वभाव है जो दूसरों की नकल करने के बजाय मेरे अपने अस्तित्व से निकलता है?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या मैं अपनी ऊँचाई के साथ अपनी जड़ों को भी स्वीकार कर रहा हूँ?

क्योंकि वृक्ष की पहचान केवल उसकी शाखाओं से नहीं होती।

उसकी वास्तविक शक्ति उसकी जड़ों में होती है।

और शायद नवरात्रि के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री हमें यही स्मरण कराती हैं—

“शक्ति को प्रकट करने से पहले शक्ति का आधार बनो।”

ऊँचा उठना है तो पहले स्थिर होना होगा।

दूसरों को प्रभावित करना है तो पहले स्वयं से जुड़ना होगा।

जीवन को बदलना है तो पहले अपनी चेतना को समझना होगा।

और यदि वास्तव में अपने स्वधर्म की ओर बढ़ना है, तो पहले यह जानना होगा कि भीतर से हम हैं कौन।

इस दृष्टि से देखें तो शैलपुत्री केवल हिमालय की पुत्री नहीं हैं।

वे मनुष्य के भीतर उस अडिग चेतना की प्रतीक हैं, जो जीवन की ऊँचाइयों की आकांक्षा रखते हुए भी अपनी जड़ों से संबंध नहीं तोड़ती।

नवरात्रि की पहली सीढ़ी इसलिए शायद शक्ति की नहीं, स्थिरता की सीढ़ी है।

क्योंकि—

जिसकी जड़ें गहरी हैं, वही ऊँचाई सह सकता है।

और जिसकी चेतना अपने मूल से जुड़ी है, वही वास्तव में अपनी शक्ति को अभिव्यक्त कर सकता है।

सूत्र :

“ऊँचाई पाने से पहले अपनी जड़ों से जुड़ना सीखिए; क्योंकि स्थिर आधार पर ही शक्ति का वास्तविक उत्कर्ष संभव है।”

!! श्रीकृष्ण अर्पणमस्तु !!

Content By – Amrendra S Kumar

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Bilingual Journalist | Hindi & English Experienced in digital and TV media, with a focus on civic, cultural and human-interest stories. Former TV producer also skilled in PR, content and storytelling. My TV work includes producing news and religious programs, while my broader experience spans public relations, business development and content production. I bring creativity, research and originality to every story I tell.

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