
नवरात्रि का दूसरा दिन था।
मंदिर में माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा हो रही थी। सामने देवी का शांत स्वरूप था—एक हाथ में जपमाला और दूसरे हाथ में कमंडलु। चेहरे पर न कोई उत्तेजना थी, न कोई अधीरता। ऐसा लगता था जैसे सम्पूर्ण सृष्टि की गति के बीच भी उनके भीतर कोई ऐसी जगह है जहाँ पूर्ण निस्तब्धता है।
मेरे साथ आया एक युवक कुछ देर तक देवी की मूर्ति को देखता रहा। फिर अचानक उसने पूछा—
“क्या तपस्या का अर्थ केवल कठिन जीवन जीना है?”
मैंने उसकी ओर देखा और पूछा—
“तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”
वह बोला—
“क्योंकि जब भी तपस्या की बात होती है, तो मुझे त्याग, उपवास, जंगल, कठिन साधना और कष्ट जैसी बातें याद आती हैं। लेकिन आज के जीवन में कोई इतना कठिन जीवन क्यों जीना चाहेगा?”
मैं मुस्कुराया।
“शायद इसलिए कि तपस्या का अर्थ कष्ट सहना नहीं, बल्कि अपने भीतर की शक्ति को किसी उच्चतर उद्देश्य के लिए एकत्र करना है।”
वह चुप हो गया।
मैंने माँ ब्रह्मचारिणी की ओर देखते हुए कहा—
“तुम जानते हो, ‘ब्रह्मचारिणी’ नाम में ब्रह्मचर्य, तप और ब्रह्म की ओर उन्मुख जीवन का गहरा संकेत मिलता है। इसे केवल इंद्रिय-संयम के अर्थ तक सीमित कर देना इसके व्यापक आध्यात्मिक संकेत को बहुत छोटा कर देना होगा।”
“तो फिर माँ ब्रह्मचारिणी हमें क्या सिखाती हैं?”
मैंने कहा—
“दिशाहीन ऊर्जा और अनुशासित ऊर्जा में वही अंतर है जो सामान्य जीवन और तपस्वी जीवन में है।”
मनुष्य के भीतर अपार ऊर्जा है।
इच्छाओं की ऊर्जा, भावनाओं की ऊर्जा, कल्पना की ऊर्जा, महत्वाकांक्षा की ऊर्जा और कर्म की ऊर्जा।
लेकिन समस्या यह नहीं है कि हमारे भीतर ऊर्जा कम है।
समस्या यह है कि हमारी ऊर्जा बिखरी हुई है।
कभी मन कुछ चाहता है, बुद्धि कुछ और कहती है। कभी हम कोई संकल्प लेते हैं और कुछ ही दिनों में उसे छोड़ देते हैं। कभी किसी लक्ष्य के लिए अत्यंत उत्साहित होते हैं, फिर किसी छोटी-सी बाधा के सामने निराश हो जाते हैं।
हम चाहते बहुत हैं, पर ठहरकर चलते कम हैं।
यहीं से ब्रह्मचारिणी का दर्शन आरम्भ होता है।
कथा है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। उस तपस्या को यदि केवल पौराणिक घटना के रूप में देखा जाए तो हम उसका आधा ही अर्थ समझ पाएँगे।
उसमें एक गहरा मनोवैज्ञानिक संकेत भी है—
जिस संभावना को जीवन में साकार करना है, उसके योग्य बनने के लिए स्वयं को तैयार करना पड़ता है।
हम प्रायः जीवन से परिणाम माँगते हैं, लेकिन अपने भीतर उस परिणाम को धारण करने की क्षमता विकसित नहीं करना चाहते।
हम सफलता चाहते हैं, पर अनुशासन नहीं।
सम्मान चाहते हैं, पर चरित्र निर्माण नहीं।
ज्ञान चाहते हैं, पर अध्ययन की निरंतरता नहीं।
स्वास्थ्य चाहते हैं, पर संयम नहीं।
आध्यात्मिक शांति चाहते हैं, पर मन को देखने का साहस नहीं।
और फिर जब परिणाम नहीं मिलता, तो हम भाग्य को दोष देने लगते हैं।
माँ ब्रह्मचारिणी मानो पूछती हैं—
“क्या तुमने अपने लक्ष्य के योग्य बनने की तपस्या की है?”
वह युवक अब ध्यान से सुन रहा था।
उसने पूछा—
“लेकिन तपस्या में इतना धैर्य कहाँ से आता है?”
मैंने कहा—
“जब लक्ष्य इच्छा से ऊपर उठकर संकल्प बन जाता है।”
इच्छा कहती है—
“मुझे यह चाहिए।”
संकल्प कहता है—
“इसके लिए मुझे स्वयं को बदलना पड़े, तो मैं बदलूँगा।”
यही दोनों के बीच का अंतर है।
इच्छा परिणाम पर केंद्रित होती है।
संकल्प यात्रा को स्वीकार करता है।
इच्छा पूछती है—
“मुझे कब मिलेगा?”
संकल्प पूछता है—
“मुझे इसके योग्य बनने के लिए आज क्या करना है?”
शायद इसी कारण माँ ब्रह्मचारिणी के हाथों में जपमाला भी है।
जपमाला केवल मंत्रों की गणना का साधन नहीं; उसे प्रतीकात्मक रूप से देखें तो वह मन को बार-बार एक ही केंद्र पर वापस लाने का माध्यम भी है।
मन बार-बार भटकेगा।
विचार आएँगे।
आकर्षण आएँगे।
भय आएगा।
संशय आएगा।
थकान आएगी।
लेकिन साधना का अर्थ यह नहीं कि मन कभी भटके ही नहीं।
साधना का अर्थ है—
मन जहाँ भी चला जाए, उसे प्रेमपूर्वक पुनः अपने चुने हुए केंद्र पर ले आना।
जैसे जप में माला का प्रत्येक मनका हमें फिर उसी नाम की ओर लौटाता है, वैसे ही जीवन में प्रत्येक विचलन हमें अपने संकल्प की ओर लौटने का अवसर दे सकता है।
और दूसरे हाथ में है कमंडलु।
कमंडलु को प्रतीकात्मक रूप से देखें तो वह हमें याद दिलाता है कि जीवन में केवल संग्रह करना ही पर्याप्त नहीं; धारण करना भी आना चाहिए।
ज्ञान मिला—क्या उसे धारण किया?
अनुभव मिला—क्या उससे सीख ली?
प्रेम मिला—क्या उसे संभाला?
अवसर मिला—क्या उसका सदुपयोग किया?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या हम अपने भीतर उस चेतना को धारण कर पा रहे हैं जिसकी हम प्रार्थना करते हैं?
युवक ने कुछ क्षण बाद पूछा—
“तो क्या तपस्या का अर्थ अपनी इच्छाओं को मार देना है?”
मैंने कहा—
“नहीं। इच्छाओं को मारना तपस्या नहीं है। इच्छाओं के ऊपर अपनी चेतना का अधिकार स्थापित करना तपस्या है।”
मन में इच्छा उठे और मनुष्य उसके पीछे भाग जाए—यह सामान्य अवस्था है।
इच्छा उठे, मन उसे देखे, बुद्धि उसका मूल्यांकन करे और फिर मनुष्य अपने विवेक के अनुसार निर्णय ले—यह आत्मनियंत्रण है।
और जब यही आत्मनियंत्रण किसी उच्चतर उद्देश्य के लिए निरंतर साधना बन जाए, तो वही तपस्या का स्वरूप ले लेता है।
माँ ब्रह्मचारिणी इसलिए केवल त्याग की देवी नहीं हैं।
वे ऊर्जा के परिष्कार की देवी हैं।
वे हमें बताती हैं कि जीवन में बड़ी उपलब्धियाँ केवल प्रतिभा से नहीं आतीं।
प्रतिभा संभावना है।
लेकिन अनुशासन उस संभावना को वास्तविकता में बदलने की प्रक्रिया है।
एक बीज में वृक्ष बनने की संभावना होती है, लेकिन केवल संभावना होना पर्याप्त नहीं। उसे मिट्टी में रहना पड़ता है, अंधकार सहना पड़ता है, अपने पुराने रूप को छोड़ना पड़ता है और धीरे-धीरे अंकुरित होना पड़ता है।
मनुष्य की चेतना भी ऐसी ही है।
कई बार जीवन हमें ऐसी परिस्थितियों में रखता है जहाँ तत्काल कोई उपलब्धि दिखाई नहीं देती।
हम प्रयास करते हैं, लेकिन परिणाम नहीं मिलता।
हम सीखते हैं, लेकिन पहचान नहीं मिलती।
हम बदलते हैं, लेकिन परिस्थितियाँ तुरंत नहीं बदलतीं।
ऐसे समय में मनुष्य के भीतर एक प्रश्न उठता है—
“क्या मेरी साधना व्यर्थ जा रही है?”
माँ ब्रह्मचारिणी का उत्तर शायद यही है—
“नहीं। हर तपस्या का पहला फल बाहर नहीं, भीतर आता है।”
तपस्या पहले व्यक्ति को बदलती है, फिर उसके कर्मों को, फिर उसके परिणामों को।
और शायद यही सबसे महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक सत्य है।
जब मनुष्य अपने लक्ष्य के लिए लगातार स्वयं को अनुशासित करता है, तो धीरे-धीरे उसका लक्ष्य केवल बाहर की वस्तु नहीं रहता। वह उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बनने लगता है।
वह सफलता प्राप्त करने वाला व्यक्ति नहीं रह जाता—
वह ऐसा व्यक्ति बन जाता है जिसके भीतर सफलता को धारण करने की क्षमता विकसित हो चुकी है।
युवक ने देवी की ओर देखा।
अब उसके चेहरे पर पहले वाली जिज्ञासा नहीं थी। शायद उसे अपने ही जीवन का कोई उत्तर मिल गया था।
मैंने उससे कहा—
“इसलिए आज माँ ब्रह्मचारिणी से केवल यह मत माँगो कि तुम्हारा कोई लक्ष्य पूरा हो जाए।”
“फिर क्या माँगूँ?”
मैंने कहा—
“यह माँगो कि तुम्हारे भीतर उस लक्ष्य के योग्य बनने का संकल्प, धैर्य, अनुशासन और निरंतरता उत्पन्न हो जाए।”
क्योंकि जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार यह नहीं कि हमें वह मिल जाए जिसकी हमने इच्छा की थी।
सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि हम स्वयं इतने बदल जाएँ कि जो कभी असंभव लगता था, वह हमारे लिए स्वाभाविक हो जाए।
माँ ब्रह्मचारिणी का शांत चेहरा जैसे कह रहा था—
“संकल्प को साधो, स्वयं को साधो; परिणाम अपने समय पर आएगा।”
और मुझे लगा, नवरात्रि का दूसरा दिन वास्तव में देवी की पूजा से अधिक अपने भीतर की बिखरी हुई ऊर्जा को एक दिशा देने का निमंत्रण है।
क्योंकि—
तपस्या लक्ष्य को पाने से पहले साधक को उस लक्ष्य के योग्य बनाती है।
सूत्र:
“तपस्या लक्ष्य को पाने से पहले साधक को उस लक्ष्य के योग्य बनाती है।”
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